मैं कॉलेज जाने के लिए घर से निकली ही थी कि मुझे लगा कि कोई मेरा पीछा कर रहा हैं आज तो कोई रिक्शा भी नहीं दीख रहा था, कॉलेज के लिए लेट भी हो रही थी तो मैंने चल कर जाना ही बेहतर समझा. इतनी सर्दी की सुबह में भी रोड बिलकुल सुनसान थी, न ही कोई गाडी वाला आ-जा रहा था. मुझे अब भी कोई मेरे पीछे आते लग रहा था, मैंने पीछे मुड़ कर देखा लेकिन कोई नज़र नहीं आया. लेकिन मुझे डर लगने लगा था, इतनी सुनसान रोड…सारी दुकाने बंद पड़ी थी, जैसे कर्फ्यू लगा हो. मैं जैसे दोड़ने लगी थी. लेकिन क्या फायदा, कॉलेज तो यहाँ से एक किलोमीटर दूर था…और तभी वो मेरे सामने वो आ गया, एक हट्टा-कट्टा, लम्बी दाढ़ी वाला, काला चोगा पहने बुढा तांत्रिक, मैं पसीने से भीग गयी, मेरे पैर बंध गए, मैं बुत बन कर खड़ी हो गयी. उसकी लाल लाल आँखे मुझे घूरने लगी. “ग्यारहवां सूत्र…” उसने कहा और मुझे अपने कंधे पर उठा लिया. दिन दहाड़े मेरा अपहरण किया जा रहा था, मैं चीखना चाहती थी, पर मेरी आवाज ही नहीं निकल रही थी, अचानक मेरी जोर से एक चीख निकली और मेरी नींद खुल गई. मैं पूरी पसीने से भीग चुकी थी.
मुझे पिछले कुछ दिनों से लगातार ऐसे सपने आ रहे थे. किसी मनोविज्ञान के स्टूडेंट के लिए सपने भी एक अध्ययन की वस्तु होते हैं, फिर चाहे वो डरावने ही क्यों न हो. लेकिन लगातार ऐसे सपने आना मेरे लिए चिंता की बात थी. शायद ज्यदा मैडिटेशन करने की वजह से ऐसा हो रहा था. मैडिटेशन के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं, मुझे अब पता चला था.****


आज कल लडकियों का कॉलेज जाना भी मुश्किल हो गया हैं. लगता हैं जैसे हम लडकियां न होकर कपड़ो की दूकान में खड़ा पुतला हो. कुछ नजरे चुरा कर देखते हैं, कुछ सीना तान कर देखते हैं, कुछ कमैंट्स करते हैं लेकिन हम सिर्फ नज़रे उठा कर देख ले तो इसे हमारी गुस्ताखी समझा जाता हैं. उन्हें ऐसा लगता हैं कि हम ‘तैयार’ हैं; और गलती से अगर किसी से बात कर लो तो उसे लगता हैं कि हमें तो बस उसी के लिए बनाया गया हैं.
कुछ लड़के हमारे कॉलेज के बाहर भी खड़े रहते हैं. उस चाय वाले की दूकान के पास, इस उम्मीद में कोई कोई न कोई तो फंसेगी. आती-जाती लडकियों को ताड़ते रहते हैं. हमें भी वैसे उनकी आदत पड़ चुकी हैं. रिक्शे से उतरते वक़्त एक बार मैने बस नज़र उठा कर उधर देखा. आज* वहाँ पर एक नया लड़का खडा था, उनके साथ नहीं, उनसे थोडा सा दूर होकर. वो शायद मुझे ही देख रहा था, मेरी नज़र उस पर पड़ी तो वो थोडा सतर्क हो गया और नजरे चुरा ली. नजरे चुराये या लड़ाए इन लडको का इरादा एक ही होता हैं, बस किसी भी तरह लड़की सेट होनी चाहिए. रिक्शे से उतर कर कॉलेज में घुसने तक वह लगातार मुझे ही देख रहा था.
वैसे वो लड़का बाकी से अलग लग रहा था, शक्ल सूरत से, पहनावे से, उसके चहरे से एक स्थिरता झलकती थी, ठहरे हुए समंदर जैसी. हो सकता वो बस किसी को कॉलेज छोड़ने आया हो. वैसे लग भी मासूम ही रहा था. अरे! नहीं…नहीं… यहाँ पहली नज़र में प्यार जैसा कुछ नहीं. यहाँ हर दूसरा लड़का अपने आप को हीरो समझता हैं, और हर लड़की को अपनी हेरोइन… हम ऐसे हर लड़के पर ध्यान देने लग जाये तो हो गया हमारा तो सत्यानाश. और वैसे भी आजकल प्यार करता ही कौन हैं? प्यार तो बस एक नाव हैं किनारे तक पहुँचने की खातिर.* ताश्री तो इन सब लफडो से दूर ही अच्छी. वैसे भी कॉलेज से लौटेते वक़्त वो लड़का मुझे वहाँ नहीं दिखा.08/01/2013
आज वापस वो लड़का वही खड़ा था और आज तो उसने नज़रे भी नहीं चुराई. लगातार मुझे घूरे ही जा रहा था. मन में तो आया* बोल दूँ कि खा जाएगा क्या? शायद वो खुद भी यही चाहता था कि मैं उसे देखते हुए देखू. अब कल स्कार्फ से चेहरा ढँक कर ही जाउंगी. घुंगट प्रथा ख़त्म हो गई पर इन छिछोरो की वजह से हमें आज भी चेहरा छुपा कर ही जाना पड़ता हैं. वैसे हम कितना भी चेहरा छुपा ले ये देख ही लेते हैं, नज़रे तो इनकी ख़राब हैं एक घुंगट इन्हें ही निकाल लेना चाहिए. आज तो वापस लौटते वक़्त भी वो वही खड़ा था मेरे साथ-साथ वो भी निकल गया.*
आज शाम को जब फेसबुक चेक किया तो एक अजीब फ्रेंड रिक्वेस्ट आई थी, ‘ब्रहम राक्षस’ नाम का कोई था. लोग आज कल दुसरो को इम्प्रेस करने के लिए क्या-क्या टोटके अपनाते हैं. एक मेसेज भी था ‘हाय’. एक लड़की के लिए यह कोई नहीं बात नहीं हैं रोज पांच-सात फ्रेंड रिक्वेस्ट आती हैं, उतने ही मेसेज. मैं फ्रेंड रिक्वेस्ट हाईड कर दोस्तों से चैट करने लगी वहां

10/01/2013
माफ़ करना, परसों डायरी लिख रही थी तभी खाना खाने के लिए माँ ने बुला लिया था. कल जो हुआ उसके बाद डायरी लिखने की हिम्मत ही नहीं बची. कॉलेज पहुँचने तक सब ठीक था. आज वो लड़का भी वहाँ नहीं था. दो पीरियड निकलने के बाद ही मेरे पेट में दर्द होने लग गया. मैं समझ गयी की यह मासिक आफत फिर से आने वाली हैं. मैंने घर के लिए निकल जाना ही ठीक समझा. दिन के बारह बज रहे थे और इस वक़्त कॉलेज के बाहर से रिक्शा मिलना मुमकिन नहीं था, मुझे आधे किलोमीटर रिक्शा स्टैंड तक चल कर ही जाना था, तब तक रास्ते में कोई न कोई रिक्शा मिल ही जाएगा. मैं धीरे-धीरे चलने लगी. कॉलेज रीन्गस से थोडा बाहर हैं और रास्ता थोडा सुनसान हैं बस गाडिया चलती है. लेकिन शुक्र हैं यह कोई सपना नहीं हैं और कोई तांत्रिक आकर मुझे उठा कर नहीं ले जाने वाला और वैसे भी मुझे किसी से डरने की जरुरत नहीं हैं.
तभी सामने से दो लड़के बाइक पर आते दिखे, ये उनमे से ही थे जो कॉलेज के बाहर चाय की दुकान पर खड़े रहते थे. पीछे वाले ने मुझे देख कर आवाज लगाई “मिस गोगल”. हाँ! कॉलेज में मेरा यही नाम पड़ गया था, मैं हमेशा एक काला चश्मा जो लगाये रहती हूँ यहाँ तक की क्ला रूम* में भी, माँ ने इसके लिए कॉलेज के डीन से बात की थी. अब इन छिछोरो को कौन समझाए कि यह चश्मा में उनकी भलाई के लिए ही लगा कर रखती हूँ.
मैं सोचते हुए जा ही रही थी तभी मुझे एक जोर का झटका लगा, मैं नीचे गिर गयी. वो दोनों लड़के वापस आये थे, उनमें से पीछे वाले ने मेरा दुप्पटा खीच लिया था. नीचे गिरने से मेरा चश्मा गिर गया था, पीछे वाला लड़का खी-खी कर हंस रहा था, तभी अचानक उसने आगे हाथ कर बाइक का ब्रेक लगा दिया. बाइक अचानक रुक गई और वो दोनों गिर गए. तभी मेरे पास एक रिक्शा आकर रुका, “बैठो गुडिया” रिक्शे वाले अंकल ने कहा. मैंने पीछे देखा वो दोनों खुद को उठाने की कोशिश कर रहे थे. मैने फटाफट चश्मा पहना और रिक्शे में बैठ गयी.
तुम ठीक तो हो, अंकल ने पूछा.
हाँ अंकल. मैंने कहा. लेकिन नीचे गिरने से मेरे घुटने में चोट आई थी और दाया हाथ भी छिल गया था.
तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड हैं?
न..नहीं मैंने सकपका कर कहा.
तो फिर वो कौन हैं? मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो कोई उन दोनो लडको की धुनाई कर रहा था. ये वही लड़का था, जो मुझे घूरता रहता था.
मुझे नहीं मालुम… मैंने धीरे से कहा.**
घर पहुँच कर मैंने घुटने पर आयोडेक्स की मालिश की और हाथ के भी दवा लगा ली. माँ को मैंने कहा कि चक्कर आकर गिर गयी थी; सच बोल कर मैं उन्हें परेशान नही करना चाहती थी. वैसे भी उन छिछोरो का इलाज तो हो चुका था.*
शाम को जब फेसबुक चलने बैठी तो एक मेसेज आया, उसी ब्रहम राक्षस का था, मैं उसे ब्लॉक करना भूल गयी थी.
तुम ठीक हो?
तुम हो कौन?
वही जिसने तुम्हे आज उन लफंगो से बचाया.
तुमने बचाया? तुमने बस उन्हें पीटा था.
बात तो एक ही हैं.
नहीं, उनका इलाज तो पहले ही हो चुका था. तुमने बेकार में ही मारपीट की.
हो सकता हैं, पर वे दौबारा ऐसा न करे इसलिए उन्हें थोडा समझाने की जरूरत थी. 
तुम कौन हो?
माँ को बोलना गुड़ और अजवाइन का हलवा बना कर खिलाये, दर्द कम हो जाएगा.
नहीं, मैंने आयोडेक्स की मालिश कर ली हैं.
मैं उस दर्द की बात नहीं कर रहा हूँ.
तुम्हे उस बारे में कैसे पता?
तुम कॉलेज से जल्दी निकली थी, तुम्हारा चेहरा दर्द से पीला पड़ा था, और ठीक से चल तक नहीं पा रही थी.
तुम आखिर हो कौन और मेरी जासूसी क्यों कर रहे हो?
कल मिलना सब बता दूंगा.
उसने लोगआउट कर दिया. अजीब इन्सान हैं, खतरनाक भी लगता हैं, ऐसे इंसान से तो मैं सात जनम में भी नहीं मिलने वाली.*15/01/2013
दो-तीन दिनों के लिये जयपुर गयी थी, मामा की तबियत ख़राब थी उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट किया गया था. अटैक था, दो तो पहले ही आ चुके थे, ये वाला तीसरा था. कुल मिलाकर* मौत के मुंह से वापस आये हैं.
कल कॉलेज गयी थी, सबकुछ नार्मल था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो, उन तीन लडको को छोड़कर बाकी सारे उस चाय की दूकान के सामने खड़े थे. शाम को फेसबुक खोला लेकिन उस ‘ब्रहम राक्षस’* तरफ से एक भी मेसेज नही था. शायद वो भूल गया था.
माँ ने एनजीओ से दो दिन की छुट्टी ली थी इसलिए आज उन्हें आने में लेट हो हो गया. खाना उन्होंने होटल से मंगवा लिया, शाम को खाना खाने के बाद मैं अपना होमवर्क कर रही थी तभी मुझे एक फ़ोन आया, अजीब नंबर थे, ‘शायद कंपनी वालो का हो’ सोचकर मैंने काट दिया. लेकिन कुछ देर बाद वापस फ़ोन आया.
हेल्लो, कौन बोल रहा हैं? मैंने पूछा.
तुम्हारे मामाजी की तबियत कैसी हैं? उधर से आवाज आई.
तुम…तुम कौन बोल रहे हो?
वही ब्रहम राक्षस.
तुम्हे मेरा नंबर कैसे मिला?
मिलना सब बता दूंगा. इतना कहकर उसने फ़ोन काट दिया.
अजीब आदमी हैं! ये मेरे से मिलने के लिए इतना बेताब क्यों हैं? वैसे लड़कियों से मिलने के लिए तो सभी बेताब होते हैं.
16/01/2013
आज जब कॉलेज पहुंची तो वो वही खड़ा था, मुझे देख कर मुस्कुराया, मैंने अपनी नज़रे घुमा ली. अब मुझे भी डर लगने लगा कि आखिर क्यों ये लड़का मेरे पीछे पड़ा हैं? आज शाम को माँ को इस बारे में बताना पड़ेगा या बेहतर होगा कॉलेज के डीन को ही इस बारे में बता दूँ.
आज मुझे प्रेक्टिकम का प्रोजेक्ट सबमिट करवाना था, इतने दिनों तक एब्सेंट रहने के कारण मेरा काफी काम बाकी था. मैंने नीता से उसका प्रोजेक्ट लिया और कॉपी करने लगी. मुझे मालुम था, मैडम इसे पकड़ लेगी लेकिन कुछ नहीं से तो थोडा बहुत ही अच्छा.
कॉलेज ख़त्म होने पर निकली तो वो अब भी वहीं खड़ा था. अजीब निठल्ले लोग हैं, इनके कुछ काम-धंधा भी होता हैं या नहीं. और मान लो अगर सप्ताह भर यहाँ जक मार कर कोई लड़की पटा भी ली तो वो कौनसा इन्हें कमा कर खिलाने वाली हैं? और ऊपर से उसके नखरे का खर्चा अलग… लेकिन होंगे अमिर बाप की औलाद, इन्हें इतनी परवाह कहाँ?
मैं धीरे धीरे चलने लगी. वो लड़का भी मेरे पीछे आने लगा. मुझे गुस्सा आने लगा था. एक बार तो दिल में आया कि मुड़ कर एक थप्पड़ मार दूँ लेकिन मैं चलती रही. वो मेरे पीछे-पीछे ही आ रहा था. मुझे घबराहट होने लगी थी, तभी वो एक दूकान में घुस गया. मैंने राहत की सांस ली. मैंने एक रिक्शा रुकवाया और उसमें बैठ गयी.
शाम को फेसबुक ओन किया तो वो ऑनलाइन था. मैंने उसे मेसेज किया.
तुम मेरा पीछा क्यों कर रहे थे?
मैं तुम्हारा पीछा कर रहा था?
हाँ, और नहीं तो क्या!
तुमने रिक्शा क्यों नहीं लिया?
कॉलेज के बाहर कोई रिक्शा था ही नहीं.
ताश्री! वहां रिक्शा था. रिक्शे वाला रिक्शा रोककर तुम्हे आवाज भी दे रहा था लेकिन तुमने सुना ही* नहीं.
(मैंने एक पल के लिए सोचा, हाँ शायद वहां रिक्शा था, अगर नहीं भी था तब भी मुझे रिक्शे का इंतज़ार करना था, मैं चलकर क्यों जा रही थी?)
तुम कॉलेज के बाहर खड़े क्यों रहते हो?
तुम्हारे लिए.
मैं ऐसी-वेसी लड़की नहीं हूँ. बेहतर होगा तुम वक़्त बर्बाद न करो और अपना काम-धंधा करो.
मैं जानता हूँ तुम ऐसी वैसी लड़की नहीं हो. तुम बहुत ही ख़ास हो ताश्री!
बकवास बंद करो, मैं तुम लडको की यह ट्रिक्स अच्छी तरह से जानती हूँ. पहले किसी लड़की के पीछे पड़ो, कुछ भी करके उससे बात करो, उससे बात करके उसे जताओ कि वह स्पेशल हैं और फिर अपना मतलब पुरा कर के भुल जाओ.
तुम जानती हो, तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नहीं हो सकता हैं. तुम एक बार मुझ से मिल लो तुम समझ जाओगी कि मैं वो नहीं हूँ जैसा तुम समझ रही हो.
तुम क्या हो मैं अच्छी तरह से समझ रही हूँ. मेरा पीछा करना बंद करो वरना मैं कॉलेज के डीन से शिकयत कर दूंगी.
तुम नहीं कर सकती.
अच्छा! तो फिर देखो.
मैंने उसे ब्लॉक कर दिया. इन छिछोरो को जितना मुंह लगाओ उतना चढ़ते हैं. इसे तो मैं कल बताउंगी ताश्री किसे कहते हैं?*

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